Thursday, April 9, 2009

सही फ़ैसला. मज़बूरी और जन आन्दोलन का डर.

मेरे पिछले दो पोस्ट मे मैंने चुनाब पर कुछ लिखा था। उसका सीधा संबंध इंदिरा गाँधी , स्वर्ण मन्दिर , चौरासी का वर्ष , कांग्रेस के उमीदवारों और एक आम आदमी के वोट करने के अधिकार और मनचाहा उमीदवार चुनने की लालसा का अल्पविश्लेषण था। एक खास वर्ग के द्वारा अभी हफ्ते भर चले जन आन्दोलन तथा वर्षों से चले आ रहे खुंदक का बड़ा ही अच्छा असर हुआ। कांग्रेस की मज़बूरी कहें या गले में आ फंसी हड्डी से बचने का उपाए। जो भी हो फ़ैसला जन हित मे हुआ। आख़िर प्रजातंत्र मे ऐसी तानाशाही कब तलक बर्दास्त की जावेगी। हिन्दी इम्पेरिअलिस्म और एक पार्टी मत से हम कब तक भारतीय कहे जाने वालों को ख़ुद से अलग-थलग रखेंगे। विभिन्न संस्कृतियों का देश भारत जहाँ कई भाषा , विचार और परिवेश के लोग रहते हैं.....उन्हें आपनी बातरखने का पूरा हक है। चंद लोगों के लिए एक पुरे समूह को दरकिनार नही किया जा सकता।
जय हिंद .....
अब मैं पुरजोर आवाज़ मे कह सकता हूँ की वोट करूँगा और पप्पू नही बनूगा.

2 comments:

amit said...

आपका सारा ब्लॉग मैंने पढा. कबीले-तारीफ है. अब कुछ मेरे शब्द इस प्रकार हैं-
हमारे देश में प्रजातंत्र है अर्थात जिसे जनता ने चुना वही सर्वोपरी है. चाहे वो क्रिमनल हो या दंगाई हो या ईमानदार हो...
और हमारा-आपका काम है बगैर किसी पर्सनल इमोशन के अच्छे को और सच्चे को चुनना... सो आप वोट जरुर दे लेकिन ईमानदारी से?

urbanlore1 said...

Dhanyavad, apna kimati samye nikalne ke liye.
Lagta hai aapne mere blog ko thik se nahi padha. niche maine saaf likha hai, pappu nahi banunga vote karunga...