Wednesday, March 4, 2009

जाट, नीग्रो और शंकर

कोई कहता है की यूँ होता है मै ये कहता हूँ की ये होता है ना जाने इस दुनिया मै क्या क्या होता है । मुनिरका की गली मै कोई नीग्रो किसी जाटको यूँ हरकता है की क्या कहें । ७६४ नंबर की बस मै रोज़ सफर करता हूँ । कंडक्टर जाट होता है हमेशा । इस तरेह सलूक करता है जैसे नीग्रो की खुंदक मुझ बिहारी पर निकल रहा हो । फ्रस्ट्रेशन । क्या करे बेचारा जाट होने के बावजूद शरीर से कम पड़ता है। मुझे इसका दुःख नही होता , मै बिहारी हूँ और मुझे jhelne की आदत है... कबी कभी तो बिहारिओं को भी झेलना पड़ता है। अब शंकर भाई को ही liijiiye रोज़ सुबह तलक शाम अंगरेजी का धौंस जमाते है॥ मै क्या करू मजबूर हूँ, ७६४ की तरेह । मुझे कुछ जुगत सूझती है, और कहता हूँ उनके गंजेपने पर फाकते कसते हुए की मिया मुनिरुद्दीन से तेल ले आओ , मालिश करो फायदा होगा। लेकिन फिर फंश जाता हूँ... वो कहते है उमर अब्दुल्ला और राहुल गाँधी को देखा है ...... अब तो उन्होंने रूपये १३५० का chashma भी खरीद लिया लिया है ....पक्के नवाब लगेंगे अब तो वे...
मै कुछ नही कह सकता,
तुम फिर जीत गए.

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